Friday, 14 December 2018

Apnapan

कभी कभी हमारी जिन्दगी में ऐसे मुकाम आ जाते हैं, जहां जिन्दगी जीने की ईच्छा ही खत्म हो जाती है। मगर उसमें भी सबसे मरा भी नहीं जाता। सबकी इतनी हिम्मत नहीं होती कि वो मर जाए। मरने में भी इन्सान मजबूरियों में फंसा होता है। कोई परिवार के मोह में फंसा है तो कोई मरने के दर्द से ही डरता है।
 
लोग कहते हैं अपने जरूरी है मगर अपने कहां काम आते हैं आजकल। अपने तो सिर्फ अपने कहलाने के लिये रह गये हैं। कभी कभी गैर इतने काम आ जाते हैं कि अपनों के लिये अपनापन बहुत छोटा लगता है। मगर फिर भी उस बन्धन में बंघे है कि अपनो को अपना कहना पड़ता है जो गैरों से भी गये गुजरे हैं। क्या वो गैर ज्यादा अपने नहीं है जो मुसीबत में अपनो की जगह खड़े होकर आपको मुसिबत से बाहर निकालते हैं। पर क्या करे सामाजिक जीव हैं, जो समाज के साथ चलने को मजबूर हैं। 

कहते हैं खून, खून ही होता है। इन्सानी फितरत है, अपने कितने भी गलत क्यों न हो गुस्सा खत्म होने के बाद अपनापन फिर से आने लग जाता है। और गैरों के किये गये अहसानों पर मिट्टी जमती रहती है और वो एक दिन सिर्फ याद बनकर ही रह जाते हैं।  

ऐसे भी देखे हैं, मैने जो जरूरत के वक्त आपको भगवान कहेेंगे। ऐसा भी नहीं कि वो झुठ बोल रहा है। मगर जैसे-जैसे उसके घाव भरते जायेंगे वो अहसान को भुलता चला जायेगा। अगर किसी दिन उस अहसान, मदद करने वाले को उसकी जरूरत पड़ गयी तो वो पीछे हट जाता है। इस हिसाब से तो कभी किसी कि मदद करनी ही नहीं चाहिये मगर सबका दिल एक सा नहीं होता। कुछ लोगों के दिल में ही डिफेक्ट होता है जो हमेशा मदद के लिये तैयार हो जाता है। शायद आज भी कुछ इन्सान बचे हैं, इन लोगों के बीच जो अपने आप को इन्सान कहते हैं। 

Monday, 31 August 2015

WHY ARE YOU BORN?

तुम क्यों पैदा हुए?

क्या कभी तुमने सोचा है, तुम क्यों पैदा हुए? हर इंसान बस दूसरों को देख कर उसके पीछे लगा हुआ है कि उसने जो किया हमें उससे भी ज्यादा अच्छा करना है। आखिर हम क्यों जी रहे हैं?
मैने ऐसे ही कुछ लोगों को पुछा तुम क्यों जी रहे हो? किसी ने कहा नाम कमाना है तो किसी ने कहा कुछ मुकाम हासिल करना है। लेकिन अधिकतर लोगों के जवाब मिले पैसा कमाना है ताकि वो और उसका परिवार खुश रह सके।
फिर जहां तक मैं सोच पाया मुझे लगता है इंसान खुशी के लिये इतनी भागदौड़ करता है, संघर्ष करता है पर अन्त तक उसे वो खुशी नहीं मिल पाती जिसके लिये वो पैदा हुआ है। क्योंकि उसने उस खुशी को पहचाना ही नहीं।
अब हम शुरूआत से चले तो एक बच्चा जब जन्म लेता है उसके तीन साल बाद उसकी पढ़ाई शुरू हो जाती है। अब सोचे पढ़ना क्यों जरूरी है? ज्ञान के लिये। ज्ञान क्यों चाहिये? किसी को नौकरी के लिये तो किसी को बिजनस के लिये ज्ञान चाहिये। तो फिर 3 साल की उम्र से लेकर लगभग 25 साल की उम्र तक वो लगातार पढ़ाई में मेहनत करता रहता है कि उसे एक अच्छी नौकरी मिले या अच्छा व्यवसाय स्थापित हो जाए।
अब आगे बढ़े तो नौकरी क्यों चाहिये? व्यवसाय क्यों जमाना है? जवाब मिला पैसा कमाना है, नाम कमाना है। तो फिर 10 साल नौकरी या व्यवसाय को पूर्णतया स्थापित करने में निकल जाते हैं या ये कहे सेटल होने में लगते हैं। तब तक शादी हो जाती है और बच्चे भी हो जाते हैं। फिर जीवन में लक्ष्य बनता है अपने बीबी बच्चों की जरूरतें पूरी करना और उन्हें खुश रखना जैसा की उसके माता पिता ने उसके लिये किया था शायद उससे बेहतर।
जरूरते पूरी करनी है। क्या जरूरते? किसने पैदा की जरूरते? क्या इंसान की जरूरते इतनी है कि एक इंसान का पूरा जीवन उसे पूरा करने में निकल जाए। मुझे नहीं लगता। एक साधारण जीवन की बात करे तो केवल दो वक्त का खाना, पहनने के लिये कुछ कपड़े और रहने के लिये छोटी सी जगह चाहिये। जरूरते तो पड़ौसियों ने पैदा की। पड़ौसियों ने इस लिये कि हमें उनसे बेहतर दिखना है। घर अच्छा चाहिये क्योंकि हमें किसी से कम नहीं दिखाना। शौकसामान और हर वो चीज जो हमारी ख्वाहिश या जरूरत बन चुकी है वो शायद जीने के लिये इतनी जरूरी नहीं है।
तो क्या ये कह सकते हैं कि किसी को दिखाने के लिये तुमने जीवन भर पढ़ाई की, मेहनत की, पैसा कमाया। एक हद तक यह कहना गलत नहीं होगा।
एक बिन्दू यह भी है कि पैसा इसलिये चाहिये ताकि खुश रह सके। अब खुशी की परिभाषा भी तो आपने ही अपनी जरूरतों के हिसाब से और दिखावे के लिये बदल दी है। पर खुशी कहां? एक छोटे से परिवार की बात करें तो बच्चें सुबह जल्दी दौड़ते भागते स्कूल जाते हैं, पति दौड़ते भागते आॅफिस जाता है और पत्नी उनके जाने की तैयारी में दौड़ती भागती है। इस दौड़ भाग की दिनचर्या में रात को 8—9 बजे लगभग सभी एक साथ होते हैं। वहां भी खुशी के लिये समय नहीं होता। बच्चों को होमवर्क करना होता है तो आॅफिस जाने वाले को प्रजेन्टेशन या प्रेाजेक्ट पूरे करने होते हैं। फिर थोड़ा बचा समय टीवी में चला जाता है। फिर नींद ऐसी लगती है कि परिवार तो दूर पति पत्नी आपसे में बात भी नहीं कर पाते। फिर अगली सुबह वही कहानी। हां महिने में कभी कभार वीकेन्ड हो जाता है।
पर इस सब में मुझे खुशी नहीं नजर आई कहीं। क्या इस खुशी के लिये पूरा जीवन गुजार दिया। देखते ही देखते उम्र पूरी हो जाती है। मगर एक अच्छी बात यह भी है कि उम्र के उस पड़ाव पर दुख भी नहीं होता कि जीवन में खुशी नहीं मिली क्योंकि उसे खुशी की परिभाषा ही नहीं मालूम। वो तो बस ये सोचकर खुश होता है कि उसने कितना कमा लिया और बच्चे सेटल हो गये और खुब नाम कमा लिया।
क्या कभी सोचा पीछले जन्म में अगर होता है तो आप क्या थे? क्या पूर्व जन्म् के आपके बच्चे खुश होंगे? आपने क्या अच्छा या क्या बुरा किया था आपके पूर्व जन्म के परिवार के लिये? ये किसी को याद नहीं रहता। तो मरने के बाद नाम, पैसा परिवार की खुशी कुछ मायने नहीं रखती, यही सत्य है।
तो आप किस खुशी के लिये जीए?
एक जीवन की कल्पना करते हैं। एक छोटा सा मकान है, थोड़ी बहुत मेहनत से खानापीना चल रहा है। जरूरते कुछ नहीं है खाने और पहनने क अलावा। नहीं चाहिये शान शोहरत, गाड़ी बंगला, पैसा कुछ नहीं। बस उसके खाने का इंतजाम हो जाये वो ही काफी है। उनके पास वक्त ही वक्त है परिवार के लिये। जहां सो जाये वहीं चैन की मस्त नींद लेते हैं। किसी को कुछ दिखाने की चिन्ता नहीं। मस्त खाते हैं, मस्ती से सोते हैं, घुमतेफिरते हैं और परिवार के साथ खुश रहते हैं। हम जिन्हें गरीब के नाम से भी जानते हैं।
सही मायने में जीवन का मतलब उन्हें ज्यादा पता है हमसे। खुश रहना। हम खुशी कमाते हैं। वो हर चीज में खुशी ढुंढ लेते हैं। एक शब्द है सलीका। आधी समस्याओं का कारण तो सलीका ही है। इस सलीके के लिये हम अपने आप को बहुत तकलीफ देते हैं पर झुठ है ये। जो सलीके से नहीं रहते वो खुश रहते हैंं।
आखिर हम क्या और किसको साबित करने की दौड़ में लगे पड़े है। मैं तो बस यही समझा हूं जीवन है सिर्फ खुश रहने के लिये। खानापीना, घुमनाफिरना, लोगों से मिलते हुए हमेशा खुश रहना और चैन की नींद लेना। जैसेजैसे जरूरते बढेगी, परेशानियां और तकलिफें अपनेआप बढ़ती चली जायेगी। एक पल के लिये अपने आप को इन सबसे मुक्त करके असली खुशी को तलाशने की कोशिश करे तो बहुत अच्छा महसूस होगा।
शायद ये मेरी नकारात्मक सोच है पर एक हद तक मुझे सही भी लगी।
  — राजन रोहल्या (31 अगस्त 2015)