कभी कभी हमारी जिन्दगी में ऐसे मुकाम आ जाते हैं, जहां जिन्दगी जीने की ईच्छा ही खत्म हो जाती है। मगर उसमें भी सबसे मरा भी नहीं जाता। सबकी इतनी हिम्मत नहीं होती कि वो मर जाए। मरने में भी इन्सान मजबूरियों में फंसा होता है। कोई परिवार के मोह में फंसा है तो कोई मरने के दर्द से ही डरता है।
लोग कहते हैं अपने जरूरी है मगर अपने कहां काम आते हैं आजकल। अपने तो सिर्फ अपने कहलाने के लिये रह गये हैं। कभी कभी गैर इतने काम आ जाते हैं कि अपनों के लिये अपनापन बहुत छोटा लगता है। मगर फिर भी उस बन्धन में बंघे है कि अपनो को अपना कहना पड़ता है जो गैरों से भी गये गुजरे हैं। क्या वो गैर ज्यादा अपने नहीं है जो मुसीबत में अपनो की जगह खड़े होकर आपको मुसिबत से बाहर निकालते हैं। पर क्या करे सामाजिक जीव हैं, जो समाज के साथ चलने को मजबूर हैं।
कहते हैं खून, खून ही होता है। इन्सानी फितरत है, अपने कितने भी गलत क्यों न हो गुस्सा खत्म होने के बाद अपनापन फिर से आने लग जाता है। और गैरों के किये गये अहसानों पर मिट्टी जमती रहती है और वो एक दिन सिर्फ याद बनकर ही रह जाते हैं।
ऐसे भी देखे हैं, मैने जो जरूरत के वक्त आपको भगवान कहेेंगे। ऐसा भी नहीं कि वो झुठ बोल रहा है। मगर जैसे-जैसे उसके घाव भरते जायेंगे वो अहसान को भुलता चला जायेगा। अगर किसी दिन उस अहसान, मदद करने वाले को उसकी जरूरत पड़ गयी तो वो पीछे हट जाता है। इस हिसाब से तो कभी किसी कि मदद करनी ही नहीं चाहिये मगर सबका दिल एक सा नहीं होता। कुछ लोगों के दिल में ही डिफेक्ट होता है जो हमेशा मदद के लिये तैयार हो जाता है। शायद आज भी कुछ इन्सान बचे हैं, इन लोगों के बीच जो अपने आप को इन्सान कहते हैं।